रोसड़ा में ‘सूखे नशे’ की चपेट में युवा पीढ़ी; 10 में से 8 युवा शिकार, चाय की टपरियां बनीं नशे का अड्डा।

रोसड़ा (समस्तीपुर): बिहार में शराबबंदी के बाद अब ‘सूखे नशे’ का कारोबार कैंसर की तरह फैलता जा रहा है। समस्तीपुर जिले के रोसड़ा अनुमंडल में स्थिति बेहद भयावह हो चुकी है। हाल ही में किए गए एक अनौपचारिक सर्वे के चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जिसके अनुसार क्षेत्र के 10 में से 8 युवा किसी न किसी प्रकार के सूखे नशे की गिरफ्त में हैं।

दवा से लेकर घातक रसायनों तक का सेवन
​युवा पीढ़ी केवल गांजा या चरस तक सीमित नहीं है, बल्कि स्मैक, अफीम और सुलेशन (Suleson) जैसे घातक पदार्थों का इस्तेमाल कर रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि युवा अब नसों में ‘फोटबिन’ (Fortwin) जैसे प्रतिबंधित इंजेक्शन लेने के आदी हो रहे हैं। यह नशा न केवल उन्हें शारीरिक रूप से खोखला कर रहा है, बल्कि क्षेत्र में बेरोजगारी और अपराध के ग्राफ को भी बढ़ा रहा है।

चाय की दुकानें बनीं ‘सेफ जोन’
​स्थानीय लोगों का आरोप है कि शहर में खुले नए चाय के अड्डे और टपरियां इन नशेड़ियों के लिए सबसे सुरक्षित ठिकाना बन गए हैं। दिन ढलते ही इन अड्डों पर असामाजिक तत्वों का जमावड़ा शुरू हो जाता है। “चोरी-चुपके” यहाँ नशे के सामान की खरीद-बिक्री और सेवन बेखौफ जारी रहता है। देर रात तक इन दुकानों के खुले रहने के कारण आपराधिक साजिशें और नशाखोरी और आसान हो गई है।

स्थानीय नागरिकों की प्रशासन से मांग
​बढ़ते खतरे को देखते हुए जागरूक नागरिकों और अभिभावकों ने पुलिस प्रशासन से कड़े कदम उठाने की अपील की है। मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं: ​समय का निर्धारण: सभी चाय की दुकानों और अड्डों के खुलने और बंद होने का समय सख्ती से निर्धारित किया जाए।

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रात्रि गश्त: देर रात तक जमने वाली भीड़ और ‘अड्डाबाजी’ पर पुलिस अंकुश लगाए।
​औचक छापेमारी: स्मैक और प्रतिबंधित इंजेक्शन बेचने वाले गिरोहों के खिलाफ विशेष अभियान चलाकर चाय की दुकानों की सघन तलाशी ली जाए।

खतरे में भविष्य
​यदि समय रहते रोसड़ा प्रशासन और स्थानीय समाज नहीं जागा, तो बेरोजगारी और नशे का यह जानलेवा कॉम्बिनेशन आने वाली पूरी पीढ़ी को तबाह कर देगा। युवाओं का नशे की सूई की ओर बढ़ना एक बड़े सामाजिक पतन का संकेत है।

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