पटना/मुंबई: देश में बाल मजदूरी को लेकर कानून तो सख्त हैं, लेकिन इसकी व्याख्या और समाज का नजरिया दो हिस्सों में बंटा नजर आता है। एक तरफ वो बच्चा है जो चाय की दुकान या कारखानों में पसीना बहाता है ताकि उसके घर का चूल्हा जल सके, तो दूसरी तरफ वो ‘बाल कलाकार’ है जो माया नगरी की लाइटों के नीचे घंटों काम करता है। सवाल यह है कि एक को ‘अपराध’ और दूसरे को ‘हुनर’ का नाम क्यों दिया जाता है?
मजबूरी की बेड़ियाँ: जब भूख छीन लेती है बस्ता
जमीनी हकीकत यह है कि आज भी कई गली-मोहल्लों में बच्चे काम करते दिख जाएंगे।
लेकिन इसके पीछे की कहानी दर्दनाक है:
अत्यंत गरीबी: कई परिवारों के पास दो वक्त की रोटी का जरिया नहीं है।
अनाथ बचपन: कई बच्चों के सिर पर पिता या घर के मुखिया का साया नहीं होता, जिससे घर चलाने की जिम्मेदारी उनके नन्हे कंधों पर आ जाती है।
कानूनी सख्ती बनाम सहयोग: प्रशासन इन बच्चों और नियोक्ताओं पर सख्ती तो दिखाता है, लेकिन क्या इनके पुनर्वास और आर्थिक सहयोग की कोई ठोस व्यवस्था है? इन बच्चों को सिर्फ कानून की नहीं, बल्कि एक अच्छी जिंदगी की उड़ान भरने के लिए ‘सहयोग’ की जरूरत है।
हाई प्रोफाइल ‘बाल कलाकार’: हुनर या सुव्यवस्थित मजदूरी?
फिल्म सिटी और टीवी सीरियल्स में काम करने वाले बच्चों को ‘बाल कलाकार’ (Child Artist) कहा जाता है। वे भी दिन में कई-कई घंटे कैमरे के सामने बिताते हैं, डायलॉग रटते हैं और काम का दबाव झेलते हैं।
समानता का सवाल: जब एक गरीब बच्चा परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए हाथ बंटाता है, तो वह ‘बाल मजदूरी’ की श्रेणी में आता है।
विशेषाधिकार: वहीं, हाई प्रोफाइल और संपन्न परिवारों के बच्चे जब मनोरंजन जगत में काम करते हैं, तो उसे सम्मान और प्रसिद्धि की नजर से देखा जाता है।
व्यवस्था पर उठते सवाल
आखिर देश में यह दोहरीकरण क्यों? कानून की नजर में ‘काम’ की परिभाषा क्या सिर्फ सामाजिक हैसियत तय करेगी?
निष्कर्ष: बाल मजदूरी को सिर्फ कानून के डंडे से नहीं रोका जा सकता। जब तक गरीब परिवार के मुखिया को रोजगार और बच्चे को शिक्षा की गारंटी नहीं मिलेगी, तब तक ‘बचपन’ मजदूरी की आग में झुलसता रहेगा। समाज और सरकार को यह समझना होगा कि हर बच्चा चाहे वो गरीब हो या अमीर, खेल और शिक्षा का समान हकदार है।
