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लाइफ टाइम’ का वादा और 28 दिन का खेल: टेलीकॉम कंपनियों की बढ़ती मनमानी।

नई दिल्ली: भारत में दूरसंचार क्रांति के शुरुआती दिनों में जिस ‘लाइफ टाइम प्रीपेड’ ने करोड़ों उपभोक्ताओं को राहत दी थी, आज वह गुजरे जमाने की बात हो गई है। 2005 से शुरू हुआ सफर, जो ‘आजीवन मुफ्त इनकमिंग’ के वादे पर टिका था, अब हर महीने जेब काटने वाले ‘अनिवार्य रिचार्ज’ के जाल में बदल चुका है।

लाइफ टाइम से ‘मंथली रेंट’ तक का सफर
​दिसंबर 2005 में टाटा इंडिकॉम ने 999 रुपये में लाइफ टाइम प्लान लॉन्च कर बाजार हिला दिया था। इसके बाद एयरटेल, हच (अब वोडाफोन-आइडिया) और बीएसएनएल की होड़ लग गई।
​तब का वादा: एक बार रिचार्ज करो और सिम की वैधता तब तक रहेगी जब तक कंपनी का लाइसेंस (करीब 20 साल) है।
​आज की हकीकत: अब सिम एक्टिव रखने के लिए हर 28 दिन में रिचार्ज अनिवार्य है। यदि रिचार्ज खत्म हुआ, तो इनकमिंग सेवाएं भी बंद कर दी जाती हैं, जिससे उपभोक्ता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

28 दिन का गणित: साल में 13वां महीना
​टेलीकॉम कंपनियों की सबसे बड़ी ‘चालाकी’ उनके कैलेंडर में मानी जाती है। आम तौर पर महीना 30 या 31 दिन का होता है, लेकिन कंपनियां 28 दिन का प्लान देती हैं।
​गणित का खेल: 28 दिन के साइकिल की वजह से साल के अंत में उपभोक्ता से एक अतिरिक्त महीने (13वें महीने) का पैसा वसूल लिया जाता है।​ करोड़ों ग्राहकों से वसूला गया यह ‘एक अतिरिक्त महीना’ कंपनियों के मुनाफे को अरबों में पहुँचा देता है।

इनकमिंग’ बंद करना: मजबूरी या लूट?
​पहले रिचार्ज खत्म होने पर सिर्फ आउटगोइंग बंद होती थी, लेकिन अब कंपनियां इनकमिंग कॉल भी ब्लॉक कर देती हैं। यह आम आदमी की जेब पर सीधी कैंची है। जिस नंबर को लोग सालों से बैंक अकाउंट और जरूरी सेवाओं के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं, उसे चालू रखने के लिए जबरन वसूली की जा रही है।

संसद में उठा विरोध का स्वर
​हाल ही में आम आदमी पार्टी के नेता और सांसद राघव चड्ढा ने संसद में इन कंपनियों की मनमानी के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने तर्क दिया कि टेलीकॉम कंपनियां जिस तरह से टैरिफ बढ़ा रही हैं और नियमों को अपने पक्ष में मोड़ रही हैं, उससे गरीब और मध्यम वर्ग पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण के नियमों के अनुसार ‘लाइफ टाइम’ का अर्थ लाइसेंस की अवधि तक था। लेकिन कंपनियों ने चालाकी से इन नियमों के बीच रास्ता निकाला और पुरानी स्कीमों को बंद कर दिया। आज डिजिटल इंडिया के दौर में मोबाइल सिर्फ विलासिता नहीं, जरूरत है, ऐसे में यह ‘हेराफेरी’ एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकती है।

 

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