


इस साल बिहार के बगीचों में आम और लीची के पेड़ों का नजारा बदला-बदला सा है। पत्तों से कहीं ज्यादा पेड़ों पर ‘मंजर’ (फूल) नजर आ रहे हैं। समस्तीपुर और आसपास के इलाकों में आम की डालियां मंजरों के बोझ से झुक गई हैं। किसानों के चेहरे पर खुशी तो है, लेकिन एक बड़ा सवाल भी है— क्या इतने मंजरों के मुताबिक फल रुक पाएंगे।

मंजर ज्यादा, तो क्या फल भी होंगे ज्यादा?
कृषि जानकारों का कहना है कि आम के पेड़ में मंजर का अधिक आना बंपर पैदावार की पहली सीढ़ी है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर फूल फल में तब्दील हो जाए। प्रकृति के नियम के अनुसार, एक पेड़ अपने कुल मंजरों का मात्र 1 से 2 प्रतिशत हिस्सा ही फल के रूप में बचा पाता है। यदि इससे अधिक फल रुक जाएं, तो डालियां उनका वजन नहीं सह पाएंगी।

फल रुकने में बाधा बन सकते हैं ये कारण:
तापमान का उतार-चढ़ाव: यदि अचानक तापमान बढ़ता है, तो छोटे फल (टिकौले) झड़ने लगते हैं।
मधुआ कीट और फफूंद: अधिक मंजर होने पर कीटों का हमला भी तेज होता है, जो मंजरों को सुखा देते हैं।
पोषक तत्वों की कमी: अगर पेड़ को सही समय पर पानी और खाद न मिले, तो वह फलों का बोझ नहीं उठा पाता।



किसानों के लिए जरूरी सलाह
बेहतर पैदावार के लिए विशेषज्ञों ने कुछ खास उपाय बताए हैं:
हल्की सिंचाई: जब फल मटर के दाने के बराबर हो जाएं, तब हल्की सिंचाई जरूर करें।
कीटनाशक का प्रयोग: मंजरों को झुलसा रोग और मधुआ कीट से बचाने के लिए विशेषज्ञों की सलाह पर उचित छिड़काव करें।
धूल और धुंध से बचाव: अगर मौसम ज्यादा शुष्क हो, तो पानी का हल्का छिड़काव मंजरों को ताजगी दे सकता है।


हालांकि मंजरों की संख्या रिकॉर्ड तोड़ है, लेकिन अंतिम पैदावार इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले 15-20 दिनों में मौसम का मिजाज कैसा रहता है। अगर मौसम ने साथ दिया, तो इस साल आम की मिठास और बाजार में इसकी उपलब्धता दोनों ही भरपूर रहेगी।


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