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विलुप्त होने की कगार पर गौरैया: आधुनिकता की चकाचौंध में खो गई आंगन की चहचहाहट।

स्टोरी / संतोष राज समस्तीपुर बिहार।
“सुबह की पहली किरण के साथ आंगन में चूं-चूं की आवाज और धान के दानों को चुगने की वो होड़…” कभी ग्रामीण इलाकों की सुबह इसी खूबसूरती के साथ होती थी। लेकिन आज के आधुनिक युग में यह आवाजें और यह नजारे इतिहास बनते जा रहे हैं। इंसानों की सबसे करीबी दोस्त मानी जाने वाली गौरैया पक्षी (Sparrow) आज विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है।

कंक्रीट के जंगलों में खो गया आशियाना
​एक दौर था जब गांवों और कस्बों में मिट्टी के घर, खपरैल और ताड़ के पेड़ों पर गौरैया के घोंसले झूलते हुए नजर आते थे। घरों की चौखटों और रोशनदानों में गौरैया अपना आशियाना बनाती थी। लेकिन आज इंसान पक्के मकानों और आधुनिक चकाचौंध में इतना व्यस्त हो गया है कि उसने इन मासूम पक्षियों के लिए कोई जगह ही नहीं छोड़ी। कंक्रीट के मकानों में अब गौरैया को घोंसला बनाने की जगह नहीं मिलती, जिसके कारण वे हमारे आशियानों से दूर होती जा रही हैं।

​वो खेतों की रौनक और चूं-चूं का संगीत
​किसानों और बुजुर्गों को याद है कि जब खेतों में धान के बीजों को बोया जाता था, तो जैसे ही छोटे-छोटे अंकुर निकलते थे, हजारों की संख्या में गौरैया वहां पहुंच जाती थीं। खेतों में उनका एक साथ उतरना, दानों को चुगना और सामूहिक रूप से चहचहाना, ग्रामीण जीवन को एक अलग ही आनंद देता था। लेकिन आज खेतों में अत्यधिक कीटनाशकों के प्रयोग और बदलते पर्यावरण ने इनकी थाली से वो प्राकृतिक भोजन भी छीन लिया है।

विशेषज्ञों की चिंता: मोबाइल टावरों से निकलने वाला रेडिएशन, पक्के मकान, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और कीटनाशकों का बढ़ता उपयोग गौरैया की घटती आबादी के मुख्य कारण हैं।
​बचाने के लिए आगे आना होगा
​गौरैया सिर्फ एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण के संतुलन का एक अहम हिस्सा है। अगर समय रहते हम सचेत नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ी इस नन्हीं चिड़िया को सिर्फ किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएगी।

सबकी खबर आठो पहर’ की अपील:
इस चहचहाहट को जिंदा रखने के लिए अपने घरों की छतों या बालकनी में सकोरे (मिट्टी के बर्तन) में पानी और दाना जरूर रखें। मुमकिन हो तो अपने घरों के आसपास कृत्रिम घोंसले लगाएं, ताकि यह नन्ही परी फिर से हमारे आंगाने में चहक सके।

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