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हिंदी दिवस पर डॉ. विपिन बिहारी ठाकुर की 16वीं पुण्य स्मृति पर कवि सम्मेलन, साहित्यकारों ने किया व्यक्तित्व-कृतित्व का स्मरण

हिंदी दिवस के अवसर पर सोमवार को रोसड़ा बाजार स्थित एक निजी रिसॉर्ट में शहर के प्रख्यात साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं हिंदी भाषा के समर्पित साधक डॉ. विपिन बिहारी ठाकुर की 16वीं पुण्य स्मृति दिवस पर कवि सम्मेलन सह स्मृति समारोह का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में साहित्यकारों, शिक्षाविदों और साहित्यप्रेमियों ने उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को याद करते हुए हिंदी साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान पर विस्तार से चर्चा की।कार्यक्रम का उद्घाटन वरिष्ठ साहित्यकार शिवेंद्र कुमार पांडेय, विशिष्ट अतिथि साहित्यकार डॉ. गगन देव चौधरी, साहित्यकार नरेंद्र कुमार सिंह तथा साहित्य परिषद के अध्यक्ष एवं यूआर कॉलेज रोसड़ा के पूर्व प्रधानाचार्य प्रो. शिवशंकर प्रसाद सिंह ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया। 

इसके बाद अतिथियों एवं उपस्थित लोगों ने डॉ. विपिन बिहारी ठाकुर के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी।समारोह में वक्ताओं ने कहा कि डॉ. विपिन बिहारी ठाकुर ने हिंदी साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में ऐसा योगदान दिया, जिसे रोसड़ा के लिए गौरव की बात है। उन्होंने अपनी लेखनी, साहित्यिक चिंतन और शैक्षणिक गतिविधियों के माध्यम से रोसड़ा की पहचान को व्यापक स्तर पर स्थापित किया। हिंदी भाषा के प्रति उनका समर्पण और साहित्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता नई पीढ़ी के लिए भी प्रेरणादायक है।वक्ताओं ने कहा कि डॉ. ठाकुर का व्यक्तित्व केवल एक साहित्यकार तक सीमित नहीं था। वे कुशल शिक्षक, प्रशासक और साहित्य के गंभीर अध्येता भी थे। शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करते हुए उन्होंने विद्यार्थियों और साहित्यप्रेमियों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।4 मई 1939 को रोसड़ा शहर के डगवर टोली मोहल्ले में जन्मे डॉ. विपिन बिहारी ठाकुर ने अपना पूरा जीवन हिंदी भाषा एवं साहित्य की सेवा में समर्पित कर दिया। यूआर कॉलेज रोसड़ा में उन्होंने विभागाध्यक्ष से लेकर प्रधानाचार्य तक की जिम्मेदारी संभाली। 

ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय में भी उन्होंने महत्वपूर्ण शैक्षणिक दायित्व निभाए। वे मानविकी संकाय के डीन के साथ-साथ विश्वविद्यालय की सीनेट एवं सिंडिकेट के सदस्य रहे।समारोह में वक्ताओं ने कहा कि डॉ. ठाकुर ने शिक्षा और साहित्य दोनों क्षेत्रों में समान रूप से योगदान दिया। उनकी विद्वता, अध्ययनशीलता और साहित्य के प्रति गंभीर दृष्टिकोण ने उन्हें अपने समय के महत्वपूर्ण साहित्यकारों में स्थान दिलाया।कवि सम्मेलन में शामिल साहित्यकारों ने डॉ. विपिन बिहारी ठाकुर के जीवन संघर्ष, साहित्यिक यात्रा और उनकी प्रमुख रचनाओं पर प्रकाश डाला। वक्ताओं ने उनकी रचनाओं के विभिन्न पहलुओं की व्याख्या करते हुए कहा कि समय बदलने के बावजूद उनके साहित्य में व्यक्त विचार आज भी प्रासंगिक हैं।कवियों ने हिंदी भाषा की समृद्ध परंपरा, साहित्य की भूमिका और समाज में साहित्यकारों के योगदान पर आधारित रचनाएं भी प्रस्तुत कीं। 

कविताओं के माध्यम से डॉ. ठाकुर की साहित्यिक साधना को याद किया गया। कार्यक्रम में मौजूद साहित्यप्रेमियों ने कवियों की रचनाओं का आनंद लिया और डॉ. ठाकुर के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की।डॉ. विपिन बिहारी ठाकुर का निधन 14 सितंबर 2010 को प्रयागराज में हुआ था। उनके निधन के वर्षों बाद भी रोसड़ा और आसपास के साहित्यिक क्षेत्र में उनकी स्मृति जीवंत है। समारोह में साहित्यप्रेमियों ने कहा कि जिस साहित्यकार और शिक्षाविद् ने अपनी लेखनी एवं विद्वता के माध्यम से रोसड़ा का नाम व्यापक साहित्यिक मंचों तक पहुंचाया, उनकी स्मृति को शहर की सार्वजनिक पहचान से जोड़ने की दिशा में पहल होनी चाहिए।साहित्यकारों ने कहा कि नई पीढ़ी को डॉ. ठाकुर के जीवन और साहित्यिक योगदान से परिचित कराने के लिए उनके नाम पर साहित्यिक आयोजन, व्याख्यान, पुस्तकालय अथवा स्मृति कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए। 

इससे स्थानीय साहित्यिक परंपरा को मजबूती मिलेगी और युवा पीढ़ी को अपने क्षेत्र के साहित्यकारों के योगदान की जानकारी भी मिल सकेगी।समारोह में शंकर सिंह सुमन, रामस्वरूप सहनी, प्रो. प्रफुल्ल चंद्र ठाकुर समेत अन्य साहित्यकार, शिक्षाविद् एवं साहित्यप्रेमी मौजूद थे। कार्यक्रम के दौरान डॉ. विपिन बिहारी ठाकुर की साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाने और हिंदी भाषा के प्रति नई पीढ़ी में रुचि विकसित करने का संकल्प भी व्यक्त किया गया।

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