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राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (एनईपी) की तीसरी वर्षगांठ

धीरज गुप्ता की रिपोर्ट
गया राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 (एनईपी) की तीसरी वर्षगांठ के अवसर पर एक भव्य आयोजन ‘शिक्षा समागम’ के नाम से दिल्ली में 29 जुलाई को होने जा रहा है, जिसमें देश के यशस्वी प्रधानमंत्री का मार्गदर्शन प्राप्त होगा। उच्च शिक्षण संस्थाओं और स्कूली शिक्षण संस्थाओं का दायित्व केवल राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के क्रियान्वयन तक ही सीमित नहीं है। अपितु जन सामान्य तक इसको पहुँचाना तथा उससे होने वाले परिणामदायी उपलब्धियों से आम आदमी को अवगत कराना है। चौथा स्तम्भ होने के कारण मीडिया जन सामान्य तक राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की विशेषताओं और विशिष्टताओं को पहुंचाने में एक सक्षम एवं सशक्त साधन है। इसी उद्देश्य से दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय (सीयूएसबी) में एक विशेष प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया गया जिसमें विभिन्न प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक तथा वेब मीडिया के पत्रकार इकठ्ठा हुए | जन सम्पर्क पदाधिकारी (पीआरओ) ने बताया कि सीयूएसबी के प्रशासनिक भवन में प्रेस कांफ्रेंस को केन्द्रीय विद्यालय-1 गया और केन्द्रीय विद्यालय-2 के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित की गई | सीयूएसबी के कुलपति प्रो. कामेश्वर नाथ सिंह की अध्यक्षता में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में केंद्रीय विद्यालय – 1 (गया) की प्राचार्य डॉ. अमीना खातून और केंद्रीय विद्यालय – 2 (गया) के प्राचार्य श्री उमेश पांडेय भी उपस्थित थे ।कुलपति ने पत्रकारों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आपको जिज्ञासा हो सकती है, कि आखिर उच्च शिक्षण संस्थान और स्कूली शिक्षा एक मंच पर कैसे है? सहयोग एवं समन्वय है, यही तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति की विशेषता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में शिक्षा का समाग्रता में विचार किया गया है। उच्च शिक्षण संस्थान स्कूली शिक्षा को मजबूती प्रदान करें एवं माध्यमिक विद्यालय, उच्च शिक्षा संस्थाओं को शिक्षण की विधा एवं विषय वस्तु से अवगत करा सकें, इसी उद्देश्य से स्कूली शिक्षा एवं उच्च शिक्षा से जुड़े ये दोनो वर्ग शिक्षा नीति को जन-जन तक पहुँचाने में संलग्न है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 छात्रों को दीर्घकाल से चले आ रहे औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त कराने एवं भारत केन्द्रित शिक्षा को प्राविधानित करने का सबसे सशक्त माध्यम है। अब शिक्षण में राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुसार विषयों का प्रारम्भ सिगमन्ड फ्रायड, एडम स्मिथ एवं डार्विन आदि से न प्रारंभ होकर भारतीय ज्ञान तंत्र से प्रारम्भ होगा। सन् 1835 में लाए गये मैकाले ड्राफ्ट द्वारा भारत में प्रयोग में लाई गयी शिक्षा के माध्यम से लगातार भारतीय मान्यताएं एवं परम्पराएं, संस्कृति एवं संस्कार, रीति और रिवाज, ज्ञान एवं विज्ञान ही नहीं अपितु भारत की मौलिक पहचान को भी समाप्त करने के लिए लगातार प्रयास किया गया। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से हर पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञानकोष को समाहित किया गया है। दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में भी अलग से एक ‘‘भारतीय ज्ञान कोष प्रकोष्ठ’’ की शुरुआत हो चुकी है।

कुलपति ने आगे कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने किसी भी छात्र को उनके समय और आर्थिक सामर्थ्य को देखते हुए निराश नहीं किया है। अब चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम के दौरान एक वर्ष में सर्टिफिकेट, दो वर्ष मे डिप्लोमा, तीन वर्ष मे डिग्री और चार वर्ष में प्रतिष्ठा और साथ ही अगर उसका सी.जी.पी.ए. 7.5 से ज्यादा हो तो शोध भी कर सकता है। इसमें बहु-प्रवेश और बहु-निर्गमन की व्यवस्था है और इसके संचालन के लिए एकेडेमिक बैंक आफ क्रेडिट की व्यवस्था है। अब छात्र अपने क्रेडिट के साथ कहीं भी स्थानान्तरित हो सकता है, जो अभी तक संभव नहीं था। अभी तक दक्षिण बिहार केन्द्रीय विश्विविद्यालय के 2500 सर्टिफिकेट एकेडेमिक बैंक आफ क्रेडिट पोर्टल पर रजिस्टर्ड हो चुके है। छात्रों में राष्ट्रभक्ति, लोकतांत्रिक मूल्यों का संवर्धन एवं संविधान के प्रति निष्ठा की भावना को बढ़ावा देने के लिए, इस प्रकार के वैकल्पिक विषय भी पाठ्यक्रम के अंग होंगे। सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान और उनका संरक्षण भी हर नागरिक का दायित्व है।

 

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