

जहां स्थित बाबा खास के मजार पर प्रतिवर्ष कई जिलों और राज्यों से मुस्लिम और हिंदू श्रद्धालु आकर चादर पोशी करते हैं । लोगों का मानना है कि जो भी सच्चे दिल से बाबा खास के मजार पर भक्त मन्नते मांगते हैं उनकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है यही वजह है कि उर्स मेला में काफी संख्या में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है ।

बाबा खास की मजार पर लगने वाला यह मेला सांप्रदायिक सद्भाव का जीता जागता इतिहास माना जाता है । मजार पर माथा टेकने एवं चादर चढ़ाने वालों में से मुस्लिम भाइयों के साथ साथ हिंदुओं को भी काफी भीड़ देखी जाती है । यहां यह भी कहा जाता है कि जिनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती है वह चढ़ावे के रूप में मुर्गा की बलि देते हैं जिसे वितरण किया जाता है ।

मेला अध्यक्ष मोहम्मद मोइम ने बताया कि 400 वर्षों से यहां मेला लगता आ रहा है । यहां हिंदू- मुसलमान दोनों समुदाय के लोग आते हैं। बाबा खास के मजार के बारे में बताया की हजरत खाजा गरीब नवाज अजमेरी रहमतुल्लाह अलैहे के खादीम थे। जो इन स्थानों पर वीरान पड़े जंगल में आकर लेटे थे।

तभी उन्हें एक शिष्य से भेंट हुआ तभी से यह स्थान रोसड़ा दरगाह के नाम से सुप्रसिद्ध है। जहां एक तरफ बाबा खास का मजार तो दुसरी तरफ में उनके शिष्य का मजार है।

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